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नवंबर, 2023 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

Kavi S L Dhawan बड़ी ईर्षालु ये दुनिया लगे है

 बड़ी ईर्षालु ये दुनिया लगे है किसी का सुख जिसे कांटा लगे है। पराया प्राण पर सस्ता लगे है। लहू अपना उसे मंहगा लगे है मिरा जीवन मगर सस्ता लगे है यहां के पुष्प पक्षी हैं मनोहर चमन वर्ना बहुत फीका लगे है जहां प्रतिरूप हों सब उर्वशी के मुझे वो स्वर्ग का नक्शा लगे है तिरा आलाप है मिसरी कि जादू कि कड़वा सत्य भी मीठा लगे है मिले मुझको अगर तू शीश देकर ये सौदा फिर भी कुछ सस्ता लगे है। ये जीवन झूठ है इक स्वप्न जैसा मगर फिर भी 'कमल' सच्चा लगे है

Kavi S L Dhwan कोई अपना नहीं ज़माने में

 कोई अपना नहीं ज़माने में सब लगे हैं हमें बनाने में जानते जो नहीं वफादारी शोर करते हैं वो जताने में एक धड़ है, अनेक सिर हैं मगर लोग माहिर हैं सच छुपाने में मित्रता कांच से भी नाज़ुक है देर लगती न टूट जाने में गांठ पड़ती है टूट जाने पर खींच इतना न दोस्ताने में आग क्या है, पता लगे खुद को जब लगे अपने आशियाने में हों न इक रंग अगर 'कमल' दोनों मुश्किल आती है घर बसाने में              xxxxx

Kavi S L Dhawan कोई अपना नहीं ज़माने में

कोई अपना नहीं ज़माने में सब लगे हैं हमें बनाने में जानते जो नहीं वफादारी शोर करते हैं वो जताने में एक धड़ है, अनेक सिर हैं मगर लोग माहिर हैं सच छुपाने में मित्रता कांच से भी नाज़ुक है देर लगती न टूट जाने में गाँठ पड़ती है टूट जाने पर खींच इतना न दोस्ताने में आग क्या है, पता लगे खुद को जब लगे अपने आशियाने में हों न इक रंग अगर 'कमल' दोनों मुश्किल आती है घर बसाने में              xxxxx

Kavi SL Dhawan सुर न हो तो बांसुरी में कुछ नहीं

 सुर न हो तो बांसुरी में कुछ नहीं तू नहीं तो ज़िंदगी में कुछ नहीं देखते हो क्यों कुसुम सी देह तक रूप बिन क्या रूपसी में कुछ नहीं चांद ज्यों फीका लगे रजनी बिना तू नहीं तो चांदनी में कुछ नहीं कुछ खुशी में,कुछ पिएं ग़म में इसे क्यों कहें फिर वारुणी में कुछ नहीं पर-व्यथा अनुभव न हो तो जान लो आदमी सा आदमी में कुछ नहीं प्यार हमदर्दी गर आपस में न हों फिर ख़ुदा की बंदगी में कुछ नहीं हाल जग का शब्द हों तेरे 'कमल' यों न हो तो शाइरी में कुछ नहीं    ..    xxx.

Kavi S L Dhawan शोख़ तितली जिधर गई होगी

शोख़ तितली जिधर गई होगी उस तरफ हर नज़र गई होगी वो जिधर से गुज़र गई होगी ख़ुशबू ख़ुशबू बिखर गई होगी उसने ओढ़ा जो लाज का आंचल मुंह की रंगत निखर गई होगी तीर तलवार जो न कर पाए आंख वो काम कर गई होगी रूप जब चांद का ढला होगा लहर तट से उतर गई होगी दिल मचलता नहीं अब उसके लिए हुस्न की धार मर गई होगी प्यार जिसको 'कमल' मिला होगा उसकी किस्मत संवर गई होगी          xxxxxx

Kavi S L Dhawan पतझर बहार बरखा,

 पतझर बहार बरखा, कैसा भी हो नज़ारा मौसम हैं सब सुहाने, जब साथ हो तुम्हारा क्या चीज़ है महब्बत,मदिरा से भी नशीली कर दे न मस्त किसको, महबूब का इशारा जब जब हो साथ प्रियवर, लगता है सब मनोहर मैदान रेत का हो या हो नदी किनारा क्या प्रेम बेल अदूभुत, उगती कहीं कहीं है उसके गले है लगती, जिसका मिले सहारा देखा नहीं है उसको, फिर भी फ़िदा हैं दिल से नज़रें मिली तो होगा क्या, हाल फिर हमारा मन से न मन मिले तो, तन का मिलन वृथा है, मन हो नहीं झुका तो, कैसा नमन हमारा आवाज़ दो जिसे तुम , देगा जवाब वो ही रब भी 'कमल' है उसका, जिसने उसे पुकारा।

Kavi SL Dhawan Ghazal प्यार में वक़्त यों गुजरता है

 ग़ज़ल प्यार में वक़्त यों गुजरता है ज्यों परिंदा उड़ान भरता है मौसमों की ख़बर नहीं रहती प्रेम जब दिल पे राज करता है यों जवानी गुज़र गई अपनी वक़्त ज्यों नींद में गुज़रता है लहर को बांधना तो है संभव वक़्त लेकिन कहां ठहरता है प्यार हर घाव की दवाई है पीर मनकी तमाम हरता है भूल जाते हैं हम उचित अनुचित काम जब दिल पे वार करता है यह उसीका 'कमल' रहे हरदम जिस  पे दिल एक बार मरता है।

Kavi S L Dhawan Ghazal आग दिल में अगर लगी होगी

 आग दिल में अगर लगी होगी कुछ तो बाहर लपट उठी होगी जब नज़र से नज़र मिली होगी प्यार की बांसुरी बजी होगी लोग चर्चा न यों ही करते हैं वज्ह कुछ तो ज़रूर ही होगी बात जो आ न पाई होठों पर आंख ने सैन से कही होगी काम दिनभर, थकान कब उतरे रात यों ही नहीं बनी होगी देखकर दुख द्रवित न हो दिल तो आंख में फिर कहां नमी होगी दिल अकारण 'कमल' नहीं तड़पे बात कंटक सदृश चुभी होगी