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Kavi S L Dhawan Ghazal

 किसका करें खयाल किसे दर गुज़र करें सब सूरतें हसीन हैं, दिल पर असर करें जिस हुस्न पर निसार दिल-ओ-जां से आप हैं उसको बनाया जिसने, उधर भी नज़र करें कुछ खेल में, कुछ उन्स में जीवन बिता दिया अब तो चलो ख़ुदा की तरफ़ भी सफ़र करें अब तक तो उम्र बीत गई नफ़्स-ओ-हिर्स में बाकी रहा जो वक़्त उसे ख़ूबतर करें रिश्ते सभी ग़रज़ के हैं जब जान ये गए, फिर क्यों फ़िदा किसी पे भी जान-ओ-जिगर करें जाना जहां से सबको है, हो आज या कि कल, फिर क्यों न बोझ कम रखें जब भी सफ़र करें। अब तक मिला फ़साद से कुछ भी नहीं तो फिर आपस के फ़र्क क्यों न 'कमल' मुख़्तसर करें          xxxxxx

Kavi S L Dhawan Ghazal प्राण संकट में पड़ें तो नाम लीजे राम का

 प्राण संकट में पड़ें तो नाम लीजे राम का, राम से बढ़कर महातम राम के है नाम का। राम जिस पत्थर पे लिख्खा बस वही डूबा नहीं, तर गया भवसिंधु वह जिसको सहारा राम का। खेल में बचपन बिताया और यौवन भोग में, राम ही बस आसरा है ज़िंदगी की शाम का। जो संवारे ज़िंदगी अपनी न औरौं की कभी, आदमी होता नहीं है वह किसी भी काम का। दूसरों का दिल दुखाना सबसे बढ़कर पाप है, पीर हरना अन्य की है पुण्य चारों धाम का। बाद मरने के हमारे क्या किसी को लाभ है? जानवर हमसे है अच्छा, दाम जिसके चाम का। जो करेंगे सो भरेंगे, जानते हैं हम सभी, कर्म अच्छे कर लिए तो फ़िक्र क्यों परिणाम का?  फूल फल जैसा हो वांछित, बीज वैसा बीजिये, बीजकर कीकर 'कमल' कैसे मिले फल आम का?                      xxxxxxxx रचनाकार: एस  एल  धवन 'कमल' पता:।        433 सैक्टर 11 पंचकूला 134112 सम्पर्क:।   09417838090                0172/2563659 प्रमाणित करता हूं कि यह मेरी स्वरचित अप्रकाशित रचना है।

Kavi S L Dhawan बड़ी ईर्षालु ये दुनिया लगे है

 बड़ी ईर्षालु ये दुनिया लगे है किसी का सुख जिसे कांटा लगे है। पराया प्राण पर सस्ता लगे है। लहू अपना उसे मंहगा लगे है मिरा जीवन मगर सस्ता लगे है यहां के पुष्प पक्षी हैं मनोहर चमन वर्ना बहुत फीका लगे है जहां प्रतिरूप हों सब उर्वशी के मुझे वो स्वर्ग का नक्शा लगे है तिरा आलाप है मिसरी कि जादू कि कड़वा सत्य भी मीठा लगे है मिले मुझको अगर तू शीश देकर ये सौदा फिर भी कुछ सस्ता लगे है। ये जीवन झूठ है इक स्वप्न जैसा मगर फिर भी 'कमल' सच्चा लगे है

Kavi S L Dhwan कोई अपना नहीं ज़माने में

 कोई अपना नहीं ज़माने में सब लगे हैं हमें बनाने में जानते जो नहीं वफादारी शोर करते हैं वो जताने में एक धड़ है, अनेक सिर हैं मगर लोग माहिर हैं सच छुपाने में मित्रता कांच से भी नाज़ुक है देर लगती न टूट जाने में गांठ पड़ती है टूट जाने पर खींच इतना न दोस्ताने में आग क्या है, पता लगे खुद को जब लगे अपने आशियाने में हों न इक रंग अगर 'कमल' दोनों मुश्किल आती है घर बसाने में              xxxxx

Kavi S L Dhawan कोई अपना नहीं ज़माने में

कोई अपना नहीं ज़माने में सब लगे हैं हमें बनाने में जानते जो नहीं वफादारी शोर करते हैं वो जताने में एक धड़ है, अनेक सिर हैं मगर लोग माहिर हैं सच छुपाने में मित्रता कांच से भी नाज़ुक है देर लगती न टूट जाने में गाँठ पड़ती है टूट जाने पर खींच इतना न दोस्ताने में आग क्या है, पता लगे खुद को जब लगे अपने आशियाने में हों न इक रंग अगर 'कमल' दोनों मुश्किल आती है घर बसाने में              xxxxx

Kavi SL Dhawan सुर न हो तो बांसुरी में कुछ नहीं

 सुर न हो तो बांसुरी में कुछ नहीं तू नहीं तो ज़िंदगी में कुछ नहीं देखते हो क्यों कुसुम सी देह तक रूप बिन क्या रूपसी में कुछ नहीं चांद ज्यों फीका लगे रजनी बिना तू नहीं तो चांदनी में कुछ नहीं कुछ खुशी में,कुछ पिएं ग़म में इसे क्यों कहें फिर वारुणी में कुछ नहीं पर-व्यथा अनुभव न हो तो जान लो आदमी सा आदमी में कुछ नहीं प्यार हमदर्दी गर आपस में न हों फिर ख़ुदा की बंदगी में कुछ नहीं हाल जग का शब्द हों तेरे 'कमल' यों न हो तो शाइरी में कुछ नहीं    ..    xxx.

Kavi S L Dhawan शोख़ तितली जिधर गई होगी

शोख़ तितली जिधर गई होगी उस तरफ हर नज़र गई होगी वो जिधर से गुज़र गई होगी ख़ुशबू ख़ुशबू बिखर गई होगी उसने ओढ़ा जो लाज का आंचल मुंह की रंगत निखर गई होगी तीर तलवार जो न कर पाए आंख वो काम कर गई होगी रूप जब चांद का ढला होगा लहर तट से उतर गई होगी दिल मचलता नहीं अब उसके लिए हुस्न की धार मर गई होगी प्यार जिसको 'कमल' मिला होगा उसकी किस्मत संवर गई होगी          xxxxxx