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Kavi S L Dhwan ki Shayrन हो जोश तो फिर जवानी भी क्या है?i

 न हो जोश तो फिर जवानी भी क्या है? बिना गंध के रात रानी भी क्या है? कशिश हुस्न में है अगर प्यार हो तो बिना प्यार के रूपरानी भी क्या है? अगर कुछ न हो रंग ही ज़िंदगी में, खिला फिर धनुष आस्मानी भी क्या है? हवा के बिना सांस क्या,ज़िंदगी क्या! नहीं प्यास बुझती तो पानी भी क्या है? नदी काम की है बहे जो हदों में, जो तट तोड़ दे वो रवानी भी क्या है? मिले एक दिन की कि आयुष्य युग भर, तिरे साथ बिन ज़िंदगानी भी क्या है? किसी कल्पना में जो बनती है अक्सर, न सच सी लगे तो कहानी भी क्या है? वही जग बनाता , वही है मिटाता, सिवा इसके रब की निशानी भी क्या है? जियो तो किसीके लिए ही जियो तुम, 'कमल' वर्ना जीने का मानी भी क्या है?

S L Dhawan Shayri बंद आंखों से तिरा जल्वा दिखे

 बंद आंखों से तिरा जल्वा दिखे, खोलता हूं आंख तो दुनिया दिखे। चाहता हूं मैं कि रख्खूं आंख बंद, ताकि तेरा ही मुझे चेहरा दिखे। रेत सहरा की है चमके धूप में, प्यास में लेकिन मुझे दरिया दिखे। हुस्न तेरा हूर से कुछ कम नहीं, तू दिखे तो स्वर्ग का नक़्शा दिखे। लोग कहते हैं, नहीं कुछ ख़ास तू पर मुझे तू चांद का टुकड़ा दिखे। एक क़तरा ही बहुत है प्यार का, तू महब्बत का मुझे चश्मा दिखे। खो गया हूं यूं महब्बत में तिरी, ज्यों सम॔दर में नहीं क़तरा दिखे। क्या करिश्मा है नहीं ये प्यार का, ये जहां सारा मुझे अपना दिखे।

S L Dhawan (प्रिये! साथ तुम हो)

 प्रिये! साथ तुम हो, तभी तो ख़ुशी है; नहीं तो जगत में कहां माधुरी है? जहां पर खनकती तुम्हारी हंसी है, वहीं सोमरस है,  वहीं सुरपुरी है। कहें क्यों नहीं हम तम्हें च॓द्रवदना, तुम्हीं से धरा पर खिली चांदनी है। तुम्हारे बिना कल नहीं एक पल भी, यही है महब्बत, यही आशिक़ी है। सफ़र में न जाने बनें साथ कितने, निभे अंत तक जो वही दोस्ती है। हमेशा कहां रात या दिन है रहता कभी दुख, कभी सुख,यही ज़िंदगी है। भजन-आरती हो न हो किंतु जिससे किसीका भला हो वही बंदगी है। नमस्ते-नमस्कार का लाभ क्या फिर, अमल में 'कमल' गर नहीं आजिज़ी है।

S L Dhwan (तू नहीं तो कोई कमी सी है)

 तू नहीं तो कोई कमी सी है, प्राण की लौ बुझी बुझी सी है। बिन तेरे क्यों ख़ुशी नहीं देती, वाटिका तो हरी भरी सी है।                      साथ तेरे मज़ा ये देती धी, अब शिशिर की हवा छुरी-सी है। सर्द झोंके हवा के चुभते हैं, संग जो तू न माधुरी-सी है। मन लुभाये, मगर न हाथ आए, मानवी है कि तू परी-सी है। तेरी तुलना न कर सके कोई, तू धरा पर इक उर्वशी-सी है। स्वप्न में भी प्रिया मिले तो 'कमल' जाग कर भी रहे ख़ुशी-सी है।

SL Dhawan (ज़िंदगी)

 क्या हमेशा जागरण है ज़िंदगी? या सदा मस्तीकरण है ज़िंदगी? भोग, मदिरा, ईश-वंदन या श्रमण, अपना अपना आकलन है ज़िंदगी। ईश में लौ है जिसे उसके लिए ध्यान, सिमरन, जप, मनन है ज़िंदगी। मात्र स्वप्नों से 'कमल' बनता है क्या? उनपे करना आचरण है ज़िंदगी।

S L Dhwan Kamal (कौन भरता है रंग फूलों में)

 तू मुझे जब भी याद आता है, मेरा मन गीत गुनगुनाता है। नाचते हैं हवा में जब पत्ते, साज़ मुझमें कोई बजाता है। कौन भरता है रंग फूलों में, कौन खिलता है, मुस्कराता है? आ बसी है कहां से ग॔ध इसमें? फूल तेरा पता बताता है। देखकर सृष्टि को चकित हूं मैं, कौन तुझ बिन इसे चलाता है? प्राण के रूप में है तू मुझमें, सूर्य भी तुझसे जगमगाता है। जब प्रकाशित तुझीसे है कण कण, आदमी क्यों न देख पाता है? मेरे भीतर भी तू है, बाहर भी, तेरा मेरा अजीब नाता है। ईश की हो नहीं कृपा तो 'कमल' सांस तक भी लिया न जाता है।