S L Dhwan (तू नहीं तो कोई कमी सी है)
तू नहीं तो कोई कमी सी है,
प्राण की लौ बुझी बुझी सी है।
बिन तेरे क्यों ख़ुशी नहीं देती,
वाटिका तो हरी भरी सी है। साथ तेरे मज़ा ये देती धी,
अब शिशिर की हवा छुरी-सी है।
सर्द झोंके हवा के चुभते हैं,
संग जो तू न माधुरी-सी है।
मन लुभाये, मगर न हाथ आए,
मानवी है कि तू परी-सी है।
तेरी तुलना न कर सके कोई,
तू धरा पर इक उर्वशी-सी है।
स्वप्न में भी प्रिया मिले तो 'कमल'
जाग कर भी रहे ख़ुशी-सी है।
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