SL Dhawan (ज़िंदगी)

 क्या हमेशा जागरण है ज़िंदगी?

या सदा मस्तीकरण है ज़िंदगी?

भोग, मदिरा, ईश-वंदन या श्रमण,

अपना अपना आकलन है ज़िंदगी।

ईश में लौ है जिसे उसके लिए

ध्यान, सिमरन, जप, मनन है ज़िंदगी।

मात्र स्वप्नों से 'कमल' बनता है क्या?

उनपे करना आचरण है ज़िंदगी।

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