S L Dhawan (प्रिये! साथ तुम हो)
प्रिये! साथ तुम हो, तभी तो ख़ुशी है;
नहीं तो जगत में कहां माधुरी है?
जहां पर खनकती तुम्हारी हंसी है,
वहीं सोमरस है, वहीं सुरपुरी है।
कहें क्यों नहीं हम तम्हें च॓द्रवदना,
तुम्हीं से धरा पर खिली चांदनी है।
तुम्हारे बिना कल नहीं एक पल भी,
यही है महब्बत, यही आशिक़ी है।
सफ़र में न जाने बनें साथ कितने,
निभे अंत तक जो वही दोस्ती है।
हमेशा कहां रात या दिन है रहता
कभी दुख, कभी सुख,यही ज़िंदगी है।
भजन-आरती हो न हो किंतु जिससे
किसीका भला हो वही बंदगी है।
नमस्ते-नमस्कार का लाभ क्या फिर,
अमल में 'कमल' गर नहीं आजिज़ी है।
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