S L Dhwan Kamal (कौन भरता है रंग फूलों में)
तू मुझे जब भी याद आता है,
मेरा मन गीत गुनगुनाता है।
नाचते हैं हवा में जब पत्ते,
साज़ मुझमें कोई बजाता है।
कौन भरता है रंग फूलों में,
कौन खिलता है, मुस्कराता है?
आ बसी है कहां से ग॔ध इसमें?
फूल तेरा पता बताता है।
देखकर सृष्टि को चकित हूं मैं,
कौन तुझ बिन इसे चलाता है?
प्राण के रूप में है तू मुझमें,
सूर्य भी तुझसे जगमगाता है।
जब प्रकाशित तुझीसे है कण कण,
आदमी क्यों न देख पाता है?
मेरे भीतर भी तू है, बाहर भी,
तेरा मेरा अजीब नाता है।
ईश की हो नहीं कृपा तो 'कमल'
सांस तक भी लिया न जाता है।
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