Kavi S L Dhwan कोई अपना नहीं ज़माने में

 कोई अपना नहीं ज़माने में

सब लगे हैं हमें बनाने में

जानते जो नहीं वफादारी

शोर करते हैं वो जताने में

एक धड़ है, अनेक सिर हैं मगर

लोग माहिर हैं सच छुपाने में

मित्रता कांच से भी नाज़ुक है

देर लगती न टूट जाने में

गांठ पड़ती है टूट जाने पर

खींच इतना न दोस्ताने में

आग क्या है, पता लगे खुद को

जब लगे अपने आशियाने में

हों न इक रंग अगर 'कमल' दोनों

मुश्किल आती है घर बसाने में

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