Kavi S L Dhawan पतझर बहार बरखा,
पतझर बहार बरखा, कैसा भी हो नज़ारा
मौसम हैं सब सुहाने, जब साथ हो तुम्हारा
क्या चीज़ है महब्बत,मदिरा से भी नशीली
कर दे न मस्त किसको, महबूब का इशारा
जब जब हो साथ प्रियवर, लगता है सब मनोहर
मैदान रेत का हो या हो नदी किनारा
क्या प्रेम बेल अदूभुत, उगती कहीं कहीं है
उसके गले है लगती, जिसका मिले सहारा
देखा नहीं है उसको, फिर भी फ़िदा हैं दिल से
नज़रें मिली तो होगा क्या, हाल फिर हमारा
मन से न मन मिले तो, तन का मिलन वृथा है,
मन हो नहीं झुका तो, कैसा नमन हमारा
आवाज़ दो जिसे तुम , देगा जवाब वो ही
रब भी 'कमल' है उसका, जिसने उसे पुकारा।
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