सेवा "सेवा परमो धर्म" बचपन से ही यह बात सब घर परिवार में सुनते आए हैं। प्राणी मात्र का जन्म सार्थक ही शायद सेवा से होता है। सेवा जब परम धर्म है तो इसके बारे में कहने को कुछ रही नहीं जाता। अपने लिए जिए तो क्या जिए तू जी ओ दिल ज़माने के लिए। अपनी सेवा तो दुनिया का हर जीव करता ही है और वह सहज ही उपलब्ध है। मानव जीवन ही एक ऐसा जीवन है जिसमें वह अपने कार्यों द्वारा पर सेवा से अपना उद्धार कर सकता है। इस धरती पर आज तक मानव चाहे किसी भी धर्म का व्याख्यान करता रहा हो पर जब आज के समय आई महामारी ने लोगों को अपने से अवगत कराया तो सेवा धर्म के अतिरिक्त कोई धर्म भी काम नहीं आया। एक सेवा ही थी जिसने प्राणी को धरती पर जीवित रहने का सौभाग्य दिया। जिस व्यक्ति ने इस महामारी के दौर में सेवा धर्म अपनाया, वह मानव से महामानव हो गया। यूंँ तो सेवा किसी भी प्रकार से की जा सकती है। इसमें जरूरी नहीं कि आप धनवान हो। सेवा के कई रूप सामने आते हैं इसका स्वरूप हम घर से ही देखना शुरू कर देते हैं। मांँ की निस्वार्थ सेवा के फल स्वरुप बच्चा कैसे एक छोटे से जीव से एक पूर्ण मानव का रूप लेता है। बच्चा मांँ के इस ...
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