Kavi SL Dhawan सुर न हो तो बांसुरी में कुछ नहीं
सुर न हो तो बांसुरी में कुछ नहीं
तू नहीं तो ज़िंदगी में कुछ नहीं
देखते हो क्यों कुसुम सी देह तक
रूप बिन क्या रूपसी में कुछ नहीं
चांद ज्यों फीका लगे रजनी बिना
तू नहीं तो चांदनी में कुछ नहीं
कुछ खुशी में,कुछ पिएं ग़म में इसे
क्यों कहें फिर वारुणी में कुछ नहीं
पर-व्यथा अनुभव न हो तो जान लो
आदमी सा आदमी में कुछ नहीं
प्यार हमदर्दी गर आपस में न हों
फिर ख़ुदा की बंदगी में कुछ नहीं
हाल जग का शब्द हों तेरे 'कमल'
यों न हो तो शाइरी में कुछ नहीं
.. xxx.
Bahut khoob
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