Shams Tabrezi Ghazal

 दिल पर जब गुज़री तो यह मंजर खुला।

रह गया था दिल का मेरे दर खुला ।

राज़ वो जिसको छुपाया उम्र भर ।

जब खुला तो देखिए मुँह पर खुला ।

पहले उसने खोली शिकवों की किताब।

 फिर शिकायत का मेरी दफ्तर खुला।

 शायरी के नाम पर क्या-क्या करें ।

जान रखें, दिल रखें या घर खुला।

मैं हूँ और वो हो तसव्वुर में के बस।

 कुंज में बैठा रहूँ यूँ पर खुला।

 मैं भी तो आसां नहीं हूँ इतना शम्स।

 लाख जतनों बाद वो जाकर खुला।


शम्स तबरेज़ी

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