सेवा "सेवा परमो धर्म" बचपन से ही यह बात सब घर परिवार में सुनते आए हैं। प्राणी मात्र का जन्म सार्थक ही शायद सेवा से होता है। सेवा जब परम धर्म है तो इसके बारे में कहने को कुछ रही नहीं जाता। अपने लिए जिए तो क्या जिए तू जी ओ दिल ज़माने के लिए। अपनी सेवा तो दुनिया का हर जीव करता ही है और वह सहज ही उपलब्ध है। मानव जीवन ही एक ऐसा जीवन है जिसमें वह अपने कार्यों द्वारा पर सेवा से अपना उद्धार कर सकता है। इस धरती पर आज तक मानव चाहे किसी भी धर्म का व्याख्यान करता रहा हो पर जब आज के समय आई महामारी ने लोगों को अपने से अवगत कराया तो सेवा धर्म के अतिरिक्त कोई धर्म भी काम नहीं आया। एक सेवा ही थी जिसने प्राणी को धरती पर जीवित रहने का सौभाग्य दिया। जिस व्यक्ति ने इस महामारी के दौर में सेवा धर्म अपनाया, वह मानव से महामानव हो गया। यूंँ तो सेवा किसी भी प्रकार से की जा सकती है। इसमें जरूरी नहीं कि आप धनवान हो। सेवा के कई रूप सामने आते हैं इसका स्वरूप हम घर से ही देखना शुरू कर देते हैं। मांँ की निस्वार्थ सेवा के फल स्वरुप बच्चा कैसे एक छोटे से जीव से एक पूर्ण मानव का रूप लेता है। बच्चा मांँ के इस ...
सुर न हो तो बांसुरी में कुछ नहीं तू नहीं तो ज़िंदगी में कुछ नहीं देखते हो क्यों कुसुम सी देह तक रूप बिन क्या रूपसी में कुछ नहीं चांद ज्यों फीका लगे रजनी बिना तू नहीं तो चांदनी में कुछ नहीं कुछ खुशी में,कुछ पिएं ग़म में इसे क्यों कहें फिर वारुणी में कुछ नहीं पर-व्यथा अनुभव न हो तो जान लो आदमी सा आदमी में कुछ नहीं प्यार हमदर्दी गर आपस में न हों फिर ख़ुदा की बंदगी में कुछ नहीं हाल जग का शब्द हों तेरे 'कमल' यों न हो तो शाइरी में कुछ नहीं .. xxx.
प्राण संकट में पड़ें तो नाम लीजे राम का, राम से बढ़कर महातम राम के है नाम का। राम जिस पत्थर पे लिख्खा बस वही डूबा नहीं, तर गया भवसिंधु वह जिसको सहारा राम का। खेल में बचपन बिताया और यौवन भोग में, राम ही बस आसरा है ज़िंदगी की शाम का। जो संवारे ज़िंदगी अपनी न औरौं की कभी, आदमी होता नहीं है वह किसी भी काम का। दूसरों का दिल दुखाना सबसे बढ़कर पाप है, पीर हरना अन्य की है पुण्य चारों धाम का। बाद मरने के हमारे क्या किसी को लाभ है? जानवर हमसे है अच्छा, दाम जिसके चाम का। जो करेंगे सो भरेंगे, जानते हैं हम सभी, कर्म अच्छे कर लिए तो फ़िक्र क्यों परिणाम का? फूल फल जैसा हो वांछित, बीज वैसा बीजिये, बीजकर कीकर 'कमल' कैसे मिले फल आम का? xxxxxxxx रचनाकार: एस एल धवन 'कमल' पता:। 433 सैक्टर 11 पंचकूला 134112 सम्पर्क:। 09417838090 0172/2563659 प्रमाणित करता हूं कि यह मेरी स्वरचित अप्रकाशित रचना है।
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