Rajesh Tiwari: Skand mata,katyayni mahamaya,Maa kaalratri,Maha gauri

 पंचम् स्कन्द माता 



ओ स्कन्द की माता ।

तेरा जश जग गाता ।।

कमल पुष्प कर में शोभित है ।

सो  मधु प्रेमी भौंरे लोभित है ।।

अंक में तेरे   षड़ानन सोहें ।

रूप देख सुरगण मन मोहें ।।

सोहें सिंह   आप असवारी ।

सुन लीजें माँ अरज हमारी ।।

हम सब भी माँ बालक तेरे ।

कृपा कर रख दो सिर मेरे ।।

मातृ रूप अतुलित है मेरा ।

वात्सल्य पाऊं माँ मैं तेरा ।।

माता तुम जग की महारानी ।

महिमा तेरी कोई ना जानी ।।

ओ कुमार की जननी भवानी ।

क्या मैं कह दूँ अकथ कहानी ।।

मातृ रूप  ह्वै जगत समानी ।

जय जय जगजननी भवानी ।।

होता  तेरा जगराता ।

ओ स्कन्द की माता ।

तेरा जश जग गाता ।।


राजेश तिवारी 'मक्खन '

झांसी उ प्र


माँ कात्यायनी



 कात्यायनी  महामाया , महायोगेश्वरी प्रणाम ।

जब जब भीर पर भक्तों पर , 

तब तुम आई काम ।।

व्रज बालायें पूजन करती श्री ,  कृष्ण को पाने को ।

बालूमय प्रतिमा को गढ़ती , लगती कीरत गाने को ।।

शक्तिपीठ है वृंदावन में , वैवाहिक पूरणकाम ।।१

कात्यायनी महामाया ........

शारद रितु  साधना जिनकी मौसम मस्त रहा है ।

नेति नेति कह वेद बखानें ,  कवियों सत्य कहा है ।।

आर्तजनों की सुनती देवी बनते बिगड़े काम ।।२.....

कात्यायनी महामाया ........


सुख शांति सम्पत्ति सुयोग्यवर देती यह महारानी ।

व्रजवनिता जो विनती कीन्ही पूरी की वह वानी ।।

षष्ठम् रूप आदिशक्ति तन आभा अनुपम धाम ।।३

कात्यायनी महामाया ,..........




माँ कालरात्रि


माँ कालरात्रि शत बार नमन ।

अर्चन वंदन भक्त  करें हवन ।।

गहनांधकार सी तेरी काया ।

कोई  समझे ना तेरी माया ।।

सिर बाल खड़े से दिखते है ।

कवि तेरे यश को लिखते है ।।

 तीननयन अनुपम विशाल ।

वाहन गर्दभ रहता निहाल ।।

दक्षिण कर वरमुद्रा वाला ।

कर एक अभयमुद्रा वाला ।।

तुम सप्त धातु साम्रांगी हो ।

तुम दुर्गुण दोष  दह्नागी हो ।।

विद्युत माला सा गले हार ।

दानव पर करती तू प्रहार ।।

ग्रह बाधा करती दूर आप ।

शुभांकर होता तेरा जाप ।।

रूप भयंकर शुभ फल है ।

तेरी कृपा से दोष जल है ।।

जो मानव  रूप में दानव है ।

उनको जग दग्ध महार्णव है ।।

सत्पथ पर मानव करें गमन ।

माँ कालरात्रि शत बार नमन ।।१


राजेश तिवारी 'मक्खन'

झांसी उ प्र







महा गौरी 



गौरी महा अति गोरी भली , जो गणपति की महतारी है ।

गोरे ही बैल पर बैठत है , गले में है हार जो प्रभकारी है ।।

गणपति की माता बड़ी  दया  वाली ये गिरिवर कुमारी है ।

श्वेत वसन ज्योति शुभ्र गहनों से चमके आभा तुम्हारी है ।।

अष्टम प्रकृति है स्वयं आप  यश माला गाते मुनि भारी है ।

अवगुणों को करती पल भर में दूर आप  जगत महरानी है ।।

अवगुण जो आठ उन्हें करती है दूर तेरे द्वार भीड़ भारी है ।

नमो नमो देवी दया की खान जय जय तेरी सबने उचारी है ।।

वरद हस्त अभय मुद्रा त्रिशूल हाथ  चन्द्र ज्योति प्यारी है ।

मक्खन मुनि मन में मनन करें ये महा गौरी माता हमारी है ।


राजेश तिवारी 'मक्खन'

झांसी उ प्र


सिद्धिदात्री

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

Dr. Sangeeta Sharma kundra सेवा परमो धर्म अर्थात सेवा ही परम धर्म है (sewa parmo dharma)sewa hi param dharam hai

Kavi SL Dhawan सुर न हो तो बांसुरी में कुछ नहीं

Kavi S L Dhawan Ghazal प्राण संकट में पड़ें तो नाम लीजे राम का